भारत की PLI योजना अमेरिका के व्यापार शुल्कों से निपटने में सहायक हो सकती है: विशेषज्ञ
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत को अपनी महत्त्वाकांक्षी मेक इन इंडिया पहल को बरकरार रखना है और अमेरिकी शुल्कों के संभावित व्यापार असर को कम करना है तो उसे उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना का विस्तार करना होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने 9 अप्रैल से भारत से आयात पर 27 फीसदी जवाबी शुल्क लगाने की घोषणा की है।
हालांकि उन्होंने फार्मास्यूटिकल्स उत्पादों, सेमीकंडक्टर, लकड़ी के सामान, तांबा और सोना, ऊर्जा संसाधन और कुछ चुनिंदा खनिजों जैसी वस्तुओं पर छूट दी है। इसके अलावा, इस्पात, एल्यूमीनियम, वाहन और वाहन पुर्जे पहले से ही धारा 232 के शुल्कों के दायरे में हैं। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन के ये शुल्क भारत को सुधारों पर तेजी से आगे बढ़ने और मेक इन इंडिया और पीएलआई योजना जैसी अपनी पहलों को आगे बढ़ाने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
पीएलआई पर ज्यादा जोर
भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के तौर पर स्थापित करने के लिए साल 2020 में पीएलआई योजना शुरू की गई थी। 1.97 लाख करोड़ रुपये की इस योजना में मोबाइल फोन, ड्रोन, व्हाइट गुड्स, दूरसंचार, कपड़े, वाहन, विशेष इस्पात, फार्मास्यूटिक दवाओं सहित 14 क्षेत्र शामिल हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा में मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का मानना है कि सरकार को अब इस योजना को आगे बढ़ाना होगा और घरेलू उद्योगों को भी सुरक्षा देनी होगी। उन्होंने कहा, ‘कपड़ा, बहुमूल्य नग और कुछ हद तक फार्मा उद्योग, जिसमें छोटे और मझोले उद्यम शामिल हैं, ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर अमेरिकी शुल्कों का असर होगा। इन क्षेत्रों में पीएलआई पर ज्यादा जोर दिया जा सकता है।’
असर कम करना
पीएलआई योजना कुछ क्षेत्रों को लगे झटके को कम कर सकती है। उदाहरण के लिए, भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात, जिसमें भारत में ऐपल के आईफोन के विनिर्माण के कारण भारी उछाल आई है, पर असर पड़ने की संभावना है। मगर जानकारों का कहना है कि स्मार्टफोन के लिए पीएलआई योजना के कारण यह क्षेत्र बेहतर स्थिति में हो सकता है।
ईवाई इंडिया में टैक्स पार्टनर कुणाल चौधरी ने कहा, ‘इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात सीधे तौर पर अमेरिकी शुल्कों से प्रभावित होगा मगर चीन और वियतनाम जैसे अपने एशियाई प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले भारत इनके असर को बेहतर तरीके से झेलने में सक्षम है। इसके अलावा, भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा पर अपने प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले तम ही असर होगा क्योंकि वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति श्रृंखला में उसका हिस्सा छोटा है। ‘ फिलहाल भारत आईफोन उत्पादन में 10 से 15 फीसदी का योगदान दे रहा है। दूसरी ओर, चीन के लिए जवाबी शुल्क 54 फीसदी है और वियतनाम पर 46 फीसदी।
प्रोत्साहन की दरकार
कपड़ा जैसे कुछ क्षेत्रों में वियतनाम, बांग्लादेश और चीन जैसे प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले भारत बेहतर स्थिति में है। इन पड़ोसी देशों को ऊंचे शुल्कों का सामना करना पड़ रहा है। मगर टेक्सपोर्ट इंडस्ट्रीज के नरेन गोयनका का कहना है कि भारत के कपड़ा उद्योग की संभावित बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए मेक इन इंडिया को और बढ़ावा देने के लिए सरकार के अधिक समर्थन की जरूरत है।
ईवाई इंडिया के मुताबिक इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) क्षेत्र के पास अमेरिकी बाजार खासकर बजट कार खंड की बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने का सुनहरा मौका है। पिछले साल अमेरिका को चीन का वाहन और पुर्जा निर्यात 17.99 अरब डॉलर था जबकि भारत का सिर्फ 2.1 अरब डॉलर। उसने कहा कि इसमें तेजी के लिए सरकार को पीएलआई योजना में अधिक वाहन पुर्जे शामिल करना चाहिए और नई कंपनियों को अवसर देने के साथ-साथ इसे दो साल के लिए बढ़ाना चाहिए।
ईवाई इंडिया में टैक्स पार्टनर सौरभ अग्रवाल ने कहा कि भारत की निर्यात क्षमता का पूरा लाभ उठाने के लिए सरकार को इस क्षेत्र में मौजूदा पीएलआई योजना का विस्तार करना चाहिए ताकि उत्पादों की व्यापक श्रृंखला को इसमें शामिल किया जा सके।
मगर चिंता भी अधिक
विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्य तौर पर घरेलू मांग पर निर्भर रहने वाली भारत की वृद्धि पर ज्यादा असर पड़ने के आसार नहीं हैं। केयरएज का अनुमान है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर ट्रंप के शुल्कों का 0.2 से 0.3 फीसदी के आसपास ही असर होगा।
केयरएज की मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा ने कहा, ‘मगर सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि घरेलू खपत और घरेलू मांग दमदार बनी रहे। इसके लिए विनिर्माण गतिविधियों और रोजगार सृजन को बढ़ावा देना जरूरी है।’
हालांकि, वैश्विक वृद्धि पर इन शुल्क के असर का आकलन अभी नहीं हुआ है। लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि दूसरे एशियाई देशों के मुकाबले भारत पर इनका असर सीमित रहेगा। लेकिन सेमीकंडक्टर जैसे अन्य क्षेत्रों पर इस तरह के और अधिक शुल्कों की अनिश्चितताओं के बीच परोक्ष असर को लेकर चिंता बरकरार है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह निजी निवेश में बाधा बन सकता है।
सिन्हा ने कहा, ‘फार्मा और सेमीकंडक्टर क्षेत्र पर और अधिक शुल्क आ सकते हैं। जब तक स्पष्टता नहीं होती, सभी कारोबारी निर्णय टाले जा सकते हैं। निजी निवेश के बढ़ने की उम्मीद थी मगर वह भी अभी रुका रहेगा।’ उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में पीएलआई योजना को बढ़ावा देने के बावजूद अगर अमेरिका में मांग पर असर पड़ता है तो भारत को अपने निर्यात को अन्य देशों की ओर ले जाना होगा।